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रूट १ - हिन्दी

वघई वनस्पति उद्यान के दक्षिण विभाग के पेड़

रूट १ पर्यटकों को सावधानीपूर्वक चुने गए कुछ प्रमुख वृक्षों से परिचित कराता है, जो वाघई बॉटनिकल गार्डन की वनस्पति, सांस्कृतिक और सौंदर्यपूर्ण समृद्धि को प्रदर्शित करते हैं। यह मार्ग द गार्डन शॉप, कैक्टस हाउस और मेडिसिनल, बांस तथा ट्यूबर, कंद जैसे थीम वाले प्लॉट्स के पास से शुरू होकर, आपको परिचित एवेन्यू पेड़ों से लेकर दुर्लभ और प्रतीकात्मक प्रजातियों तक सहज रूप से ले जाता है। इस यात्रा के दौरान आप सुगढ़ असोपालव और ऊँचे महोगनी, रेन ट्री की फैली हुई छतरी, मेडिसिनल एरिया के पास स्थित आकर्षक कैलासपती, कैनन बॉल ट्री और गूँदा, काजू, कोठू तथा बोरसली जैसे उपयोगी वृक्षों से रूबरू होंगे। इस मार्ग के प्रत्येक स्टेशन को एक अलग कहानी उजागर करने के लिए चुना गया है—छाया और काष्ठ से लेकर औषधीय महत्व, पौराणिक कथाओं और फलों तक—ताकि एंड नोट तक पहुँचते पहुँचते आप आकार, उपयोगिता और लोककथाओं से भरे एक जीवंत कक्षा से होकर गुजर चुके हों।

परिचय

नमस्कार दोस्तों, वघई बॉटनिकल गार्डन में आपका स्वागत है। 1 मई, 1966 को तत्कालीन वन अधिकारियों, उद्यान अधीक्षक, वैज्ञानिक और विद्वानों द्वारा स्थापित, यह गुजरात राज्य का सबसे बड़ा उद्यान है। क्या आपने कभी सोचा है कि वनस्पति उद्यान अन्य उद्यानों से कैसे भिन्न हैं? वानस्पतिक उद्यान अन्य उद्यानों से भिन्न हैं क्योंकि उनका प्राथमिक सरोकार विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों का जीवित संग्रह तथा उनका संरक्षण, संवर्धन हैं। यह विद्यार्थियों, विद्वानों, वनकर्मियों तथा वनस्पतियों में रुचि रखने वाले आम जनता के लिए वनस्पतिशास्त्र का प्रशिक्षण केंद्र हैं।

आमतौर पर लोग सभी पेड़ों को ऐसे देखते हैं जैसे कि वे एक जैसे हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं और उनके उपयोग क्या हैं, यह आपको वनस्पति उद्यान में ही जानने, देखने और समझने को मिलता है।

भारत के पास प्राकृतिक विविधता की समृद्ध विरासत है। दुनिया के १७ मेगा-डाईवर्स देशों में भारत एशिया में चौथे और विश्व में दसवे स्थानपर हैं। भारत में विश्वभर के ११% वनस्पतियाँ पाई जाती हैं; जिसमे १७५०० सपुष्प, ६२०० स्थानीय और ७५०० औषधीय वनस्पतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा २४६ वनस्पतियाँ ऐसी हैं जो जागतिकस्तर पे खतरे में हैं। इतनी सारी वनविविधातता दुनिया के केवल २.४ % भूमि क्षेत्र में स्थित हैं।

भारत में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पूर्वी हिमालय, इंडो-बर्मा क्षेत्र और पश्चिमी घाट यह चार जैव-विविधता हॉटस्पॉट हैं। पश्चिम घाट का उत्तरी भाग गुजरात के डांग के जंगलों से शुरू होता हैं जो बांस के लिए जाना जाता हैं।

भारत के वनों को वर्गीकृत करने की पहल १९३६ में चैंपियन ने की। और १९६८ में सेठने उसका पुनरीक्षण किया। उन्होंने भारत के वनों को उष्णकटिबंधीय से अल्पाइन तक ६ प्रमुख खंडों में और २०० से ज्यादा उपखंडों में वर्गीकृत किया। चैंपिऑन और सेठ के वर्गीकरण के आधारपर उद्यान में सदाबहार, अर्ध-पर्णपती, पर्णपती और काँटेदार वन के अलग अलग विभाग हैं। इसके अतिरिक्त उद्यान में डांग प्लॉट, बांस प्लॉट, औषधीय प्लॉट, आरोग्यवन, कंद प्लॉट, कैक्टस और ओर्किड प्लॉट जैसे विभिन्न प्लॉट देखने को मिलते हैं। उद्यान हरड़े रोड, रेन ट्री रोड, नीलगिरी, बोरसली, कोठू रोड के ७.५ किलोमीटेर लंबे सड़कों के जाल-तंत्र से जुड़ा हुआ हैं।

आपको और अधिक इंतजार न कराते हुए आपको लेके चलते हैं पौधों की यात्रा पर। आइए प्रकृति की ओर वापस जाएं, प्रकृति से प्यार करें, और पौधों की दुनिया के छिपे हुए खजाने को जानें वघई वनस्पति उद्यान के दक्षिण विभाक के पेड़ों के साथ ।

स्टेशन ००

परिचय

आप अभी वघई वनस्पति उद्यान के प्रवेश मार्ग पर हैं । इसके दोनों तरफ लगे सीधे मजबूत तने वाले पेड़ अपनी चमकदार लहराती हरी पत्तियों से प्रसन्नता पूर्वक आपका उद्यान में अभिवादन कर रहें हैं।

ये आसोपालव के पेड़ हैं। इनके तनों का सीधा और मजबूत होने के कारण इनका उपयोग मस्तूल के रूप में और जहाज में लंबे खंबे मस्तूल को बनाने में किया जाता हैं। और इसलिए इसे अंग्रेजी में इंडियन मास्ट ट्री भी कहते हैं।

चीड़ के पेड़ की तरह का शंक्वाकार छत्र चमगादड़, गिलहरी, तितलियों और अन्य जानवरों का घर है। भारत में इनका उपयोग आम के पत्तों के विकल्प के रूप में घरों को सजाने के लिए भी किया जाता है। इस पेड़ को अक्सर अशोक समझा जाता है लेकिन यह गलत हैं, जिसका उल्लेख रामायण में अशोक वाटिका के रूप में किया गया है और इसलिए इसे अंग्रेजी में फाल्स अशोक ट्री के रूप में जाना जाता है। इसके वैज्ञानिक नाम Polyalthia longifolia का अर्थ एक लंबे पत्ते वाले पेड़ है।

स्टेशन ०१

असोपालव

क्या आप एक ऐसी वनस्पति को जानते हैं जिसकी पत्ती से बासमती चावल जैसी महक आती है? एक वनस्पति जिसके पत्तों का रस पानी को जेली बना देता है और एक पत्ता जिसे चबाकर आप अपना स्वाद खो देंगे। अगर नहीं, तो आप यहां उनके बारे में जान सकते हैं। आपके सामने एक खूबसूरत सफेद रंग की कुटिया हैं, 'द गार्डन शॉप'। २०१९ में स्थापित ये शॉप आगंतुकों के लिए औषधीय एवं अन्य वनस्पति तथा बागवानी उपकरण और विभिन्न प्रकार के नक्षीदार गमलों के खरीदारी का एक महत्वपूर्ण स्थान हैं। यहाँ उद्यान से एकत्र किए गए पौधों के बीज भी बिक्री के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। हम आग्रह करते हैं की आप इसकी अवश्य भेट लें।

स्टेशन ०२

द गार्डन शॉप

गार्डन शॉप के बगल में, आपके सामने गहरे लाल-भूरे रंग के तनों वाले छह पेड़ हैं। ये पेड़ महोगनी के हैं। यह पेड़ दक्षिण अमेरिका और मैक्सिको के मूल निवासी है, जहाँ से ये अफ्रीका, एशिया और प्रशांत महासागर के द्वीपों में लाए गए हैं । इनकी खोज १७ वीं शताब्दी में हुई थी और तब से यह कैबिनेट निर्माताओं का एक पसंदीदा विकल्प रहा है। इनकी लकड़ी खारे पानी का प्रतिरोधी है और इसलिए इसका उपयोग जहाज निर्माण में किया जाता था । अभी ये उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों में उगाया जाता हैं और भारत जैसे शुष्क जलवायु में भी पनपने लगा हैं। इस पौधे का वैज्ञानिक नाम स्वीदेनिया मैक्रोफिला है। आमतौर पर इसका फल आसमान की ओर इशारा करता है और इसलिए इसे अंग्रेजी में स्काई फ्रूट के रूप में जाना जाता है। कुचले हुए फलों के छिलकों को गमलों में मिट्टी के साथ मिलाकर खाद के रूप में उपयोग किया जाता है । और छाल के गोंद का उपयोग चमड़े की रंगाई और चमक लाने के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों का स्वाद नीम की तरह कड़वा होता हैं और इसका प्रयोग बुखार के उपचार में किया जाता हैं।

स्टेशन ०३

महोगनी

उद्यान के कैक्टस हाउस में कैक्टस की सौ से अधिक प्रजातियां हैं। कैक्टस एक प्रकार का पौधा है जो रेगिस्तान जैसे शुष्क परिस्थितियों में उगता है। बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिन्हें अपने डेस्क पर कैक्टस रखने का शौक होता है क्योंकि इसे अच्छे भाग्य की निशानी माना जाता है। कैक्टि में से एक जो आसानी से पाई जा सकती है वह है ओपूँशिया इस कैक्टस के सपाट शरीर पर कांटेहैं। इसमें चमकीले पीले फूल और गोल गुलाबी-बैंगनी रंग के फल लगते हैं। और फलों के सेवन से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती हैं।

उद्यान के पुस्तकालय में सैकड़ों किताबें हैं जिनमें विभिन्न प्रदेशों के फ्लोरा, वघई वनस्पति उद्यान के सचित्र वनस्पतियां, वानिकी की किताबें, फूलों वाले पौधे, उद्यानिकी आदि शामिल हैं।

पुस्तकालय के बगल में और सड़क के अंत में, आपके सामने रेन ट्री रोड, आपके बाईं ओर टैक्सोनॉमी प्लॉट और आपके दाईं ओर एक औषधीय प्लॉट हैं । टैक्सोनॉमी विषय में विभिन्न पहलुओं के आधार पर किसी भी जीव का नामकरण और वर्गीकरण किया जाता है। इस प्लॉट में चंद्रफल, कुसुम और चुक्रसिया जैसे अनेक पेड़ हैं ।

स्टेशन ०४

कैक्टस हाउस, पुस्तकालय और टैक्सोंनोमी प्लॉट

क्या आप को पानी की बुँदे बरसती महसूस हो रही हैं? यदि हाँ, तो आप इस पेड़ को जानने के बहुत निकट हैं। यह विशाल वृक्ष, जिसके नीचे आप खड़े हैं, ये रेन ट्री के नाम से जाना जाता है। इसे एक जैसा कहे जाने के दो कारण हैं। पहला हैं गटेशन जिससे पत्तियों के माध्यम से वनस्पति में मौजूद अतिरिक्त पानी को निकाल देते हैं। और दूसरा, रात्री को इनके पत्तों का बंद होना। जब बरसात होती हैं तब बंद हुए पत्तों से पानी नीचे गिरने लगता हैं। और इसके नीचे अनेक पौधे पनपने लगते हैं। यह पेड़ छुई मुई के कुल से हैं। तो, क्या इसीलिए ये अपने पत्ते बंद कर रहा है? खैर यह तो आपको खुद पता करना होगा। और हाँ एक मजेदार बात बताती हूँ इसके फल इमली जैसे हैं पर बहुत मीठे हैं । इसके गुड जैसे मीठे फलों को चखना मत भूलना ।

स्टेशन ०५

रैन ट्री

हमारी यात्रा में अगला पेड़ बुद्धा कोकोनट है। क्या आप को पता हैं कि इसे ऐसा क्यों कहा जाता होगा? यदि आप इसके नाम पे ध्यान दे तो मालूम होगा के नारियल जैसे फलों कारण इसे यह नाम मिला हैं । इस वृक्ष का उगम मूल रूप से भारत बांग्लादेश और म्यानमार में हुआ हैं। मार्च से जून के महीनों में संकीर्ण शंक्वाकार मुकुट वाले इस पर्णपाती पेड़ में फूल और फल लगते हैं। अन्न, दवा, तेल और इंधन के लिए इस पेड़ को उपयोग में लाया जाता है। यह पेड़ सिंगापुर का हेरीटेज ट्री है।

इसके डाइवर्सिफोलिया जाति में, इसकी कोई भी दो पत्तियाँ एक जैसी नहीं होती हैं, और इसलिए इसे अंग्रेजी में मैड ट्री के नाम से भी जाना जाता है। लकड़ी हल्की और मोटे तौर पर रेशेदार होती है इसलिए इसका उपयोग चाय के बक्सों और माचिस की तीली आदि बनाने के मामलों के लिए किया जाता है। पूर्वोत्तर भारत में इनके बीजों को भूनकर खाया जाता है।

स्टेशन ०६

बुद्धा कोकोनट

भूरी छाल, चमकीली हरी पत्तियां हैं और तने से निकलती मोटी डोर पर सजे सुंदर गुलाबी फूल ऐसे जैसे कोई नाग का छत्र चढ़ा हो किसी शिवलिंग पर। यह पेड़ जो आपके सामने हैं, इसके फूल की रचना के आधार पर इसे नागलिंगम कहा जाता हैं। ऐसा माना जाता हैं के प्रातः काल इसका दर्शन करने से तथा भूमिगत फूलों को शिवलिंग पर चढ़ाने से यह जीवन में समृद्धि लाता हैं। इनके भूरे रंग के फल पुराने जमाने के तोप के गोले समान दिखते हैं और व्यास में २० सेंटीमीटर तक बढ़ते हैं इसीलिए इसे अंग्रेजी में कैनन बॉल ट्री भी कहा जाता हैं। इसकी लकड़ी नरम और तीखी गंधवाली होती है और इसका उपयोग पशुओं के त्वचा रोगों के उपचार के लिए किया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम, कौरौपिटा ग्वानेंसिस है। जो इसके उगम स्थान गयाना नामक दक्षिण अमरीका के देश को दर्शाता हैं।

स्टेशन ०७

कैलासपति

प्राचीन काल से ही, औषधीय वनस्पतियाँ मानव जाति के स्वास्थ्य और कल्याण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहीं हैं। प्राचीन काल से भारत, चीन, ग्रीस, यूरोप, अफ्रीका आदि जैसे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में चिकित्सा की कई प्रणालियाँ फली-फूलीं। उद्यान के मेडिसिनल प्लॉट में गुजरात राज्य में पाए जाने वाले औषधीय पौधे हैं। इसमे मूत्र संबंधी विकारों को ठीक करने वाला सेंजन; मधुमेह के लिए मधुनाशिनी; स्त्री रोग के लिए पुत्रंजीवा, पेट के विकारों के लिए मराड़ासिंग तथा अनंतमूल, ब्लैक करंट ट्री, कोकम, लता करंज आदि महत्त्वपूर्ण वनस्पतियाँ पाई जाति हैं। मेडिसिनल प्लॉट और आरोग्यवन को जानने के लिए एक अलग से यात्रा हैं जिसमे विभिन्न औषधीय वनस्पतियों का इतिहास और उनके उपयोग के विषय में वर्णन किया गया हैं।

स्टेशन ०८

मेडीसीनल प्लॉट

मेडिसिनल प्लॉट के उत्तर में नीलगिरी के पेड़ों की कतारें हैं। ये पेड़ ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी हैं और १७९० में टीपू सुल्तान को उनके फ्रांसीसी सहयोगियों द्वारा उपहार में दिए गए थे। इन पेड़ों की खेती उनके पत्तों के लिए की जाती है। यह संक्रमण और बुखार के लिए एक मूल उपचार के रूप में प्रयोग किया जाता है, यह एंटीसेप्टिक है और सर्दी फ्लू और गले के खराश में सहायक है। औषधीय गुणों से भरपूर यह पौधा, भारी मात्र में पानी को अवशोषित करता हैं। और स्थानीय पौधों की वृद्धि को रोकता हैं। जिससे इसका रोपण पारिस्थितिक समस्याओं का कारण बन सकता। इसके विपरीत दलदली क्षेत्र को सुखाने के लिए वृक्षारोपण फायदेमंद हो सकता है। सुप्रसिद्ध शब्द यूकैलिप्टस लैटिन भाषा से लिया गया हैं । यू का अर्थ है अच्छी तरह से और कैलीप्टस का अर्थ है ढका हुआ। चूंकि युवा अवस्था में इसकी कलियाँ पंखुड़ियों से अच्छी तरह से ढकी होती हैं और इसलिए, यूरोपीय वनस्पतिशास्त्रियों ने इसे यूकेलिप्टस नाम दिया है। आप इसकी कलियों के साथ लट्टू की तरह खेलते हैं।

स्टेशन ०९

नीलगिरी

यहां लगाए गए पेड़ इंडियन चेरी/सॉसेट बेरीज के हैं। भारत में इसे गुंदी या गुंदा के नाम से जाना जाता है। क्यों? तो, इसका एक फल तोड़ो और दबाओ, और तुम जान जाओगे। फल में चिपचिपा पदार्थ होता है जिसका उपयोग गोंद के रूप में भी किया जाता है और यह स्त्राव को रोकने के लिए, कृमिनाशक, मूत्रवर्धक, demulsent और कफोत्सारक होता है। फल का गूदा स्वाद में मीठा और पारदर्शी होता है। अपरिपक्व फलों का अचार बनाया जाता है और पत्तियों को सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। वानस्पतिक नाम कॉर्डिया डाइकोटोमा में वंश का नाम जर्मन वनस्पतिशास्त्री वी. कॉर्डस के नाम पर है। और जाति डाइकोटोमा इसकी द्विभाजित शाखाओं को दर्शाती करता है। इस पौधे में मार्च और अप्रैल के महीने में फूल आते हैं और अप्रैल से जून तक फल लगते हैं।

स्टेशन १०

गुंदा

आपके लिए दुर्लभ क्या है? वह क्यों हैं? और आप उसका संरक्षण कैसे करतें हैं? वैसे ही आपके सामने क्या-क्या खतरे हैं और आप उनसे कैसे निपटेंगे? जरा सोचिए.. ये जो प्लॉट आपके सामने हैं, ये जीवन के इन्ही पहलू पे रोशनी डालता हैं। ये हैं दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त वनस्पतियों को समर्पित प्लॉट। अंग्रेजी में इसे RET मतलब Rare, Endangered, and Threatened प्लॉट कहते हैं। हर गुजरते दशक के साथ, हम किसी न किसी प्रजाति को खो रहे हैं। हम विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को वापस लाने में सक्षम नहीं हैं, लेकिन हमारे पास आरईटी प्रजातियों के लिए आशा की एक किरण है। आरईटी प्लॉट के सामने हैं आरोग्यवन, औषधीय पौधों को समर्पित एक अन्य प्लॉट।आरोग्यवान को शाक, झाड़ी और वृक्ष में विभाजित किया गया हैं। इसमे लगाई गई वनस्पतियों की जानकारी बोर्ड पर दी गई हैं। आपसे अनुरोध हैं के इस प्लॉट को अवश्य भेट लें।

स्टेशन ११

आर ई टी प्लॉट और आरोग्यवन

इस सड़क के किनारे लगाए गए पेड़ इंद्रजव के हैं। जौ के समान बीज होने के कारण इन्हे इंद्रजव कहा जाता हैं। और अंग्रेजी में इसे ईस्टर ट्री के नाम से जाना जाता हैं। इसका मूल स्थान उष्णकटिबंधीय अफ्रीका के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप में भी हैं। हॉलेरिना प्युबेसेन्स इसका वानस्पतिक नाम है। हॉलेरिना वंश का नाम दो ग्रीक शब्दों होलोस अर्थात सम्पूर्ण और अरहेन अर्थात पुरुष से लिया गया है जिसका अर्थ संपूर्ण पुरुष होता हैं। इस पौधे का उपयोग जीर्ण अतिसार में किया जाता है और छाल बवासीर और पाचन संबंधी अन्य समस्याओं जैसे की डिसेन्ट्री के उपचार में उपयोगी है, इसलिए इसका वानस्पतिक नाम का पर्यायवाची नाम हॉलेरिना एंटीडायसेंट्रिका है। चर्म रोगों को ठीक करने के लिए इसकी छाल को अधिकतर गोमूत्र में मिलाकर प्रभावित अंगों पर लगाया जाता है। इसी प्रकार गाय के दूध के साथ छाल का चूर्ण देने से मूत्र संबंधी परेशानी दूर होती है।

स्टेशन १२

इंद्रजव

क्या आपने कभी काजू को पेड़ से तोड़ा है? अगर हाँ, तो आप को पता होगा की इसे कैसे खाना है। यदि नहीं, तो मैं हूँ ना । काजू को आप सीधे पेड़ से तोड़कर नहीं खा सकते हैं। इसमें जहरीले रसायन होते हैं इसलिए उन्हे उपयोग में लाने से पहले या तो भाप देनी पड़ती हैं या उबालते हैं। ट्रॉपिकल अमेरिका से उत्पन्न, यह पेड़ १६ वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों द्वारा भारत में लाया गया था, तब से, काजू कई मिठाइयों का एक अभिन्न घटक है। यह पौधा आम के कुल एनाकार्डिएसी से है। वनस्पति विज्ञानियों ने देखा है कि इस कुल के अधिकांश सदस्यों के पत्तों में कच्चे आम की सुगंध होती है। काजू के पेड़ पर फल अप्रैल-मई के महीने में आते हैं।

स्टेशन १३

काजू

अगर मैं आपसे पूछूं कि आप किस प्रकारकी वनस्पतियों का अक्सर सेवन करते हैं, या, आपका मुख्य भोजन में किन वनस्पतियों का समावेश है, तो आपका उत्तर क्या होगा? शायद आपका उत्तर गेहूं, चावल, बाजरा, या जवार होगा। ये सभी घास कुल के हैं। यह दुनिया भर में दस हजार से अधिक प्रजातियों वाले सबसे बड़े वनस्पतियों के कुल में से एक है। बांस उन्ही में से एक है। वघई वनस्पति उद्यान में, देशी बांस के साथ-साथ ४६ से अधिक बांस की प्रजातियों का मौजूद हैं। मनुष्य की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में भी बांस ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विभिन्न प्रकार के बांस अलग अलग उम्र में पुष्प को धरण करते हैं यह अवधि १० से ३० वर्ष तक की हो सकती हैं। बीज बनने के बाद बांस मर जाता है। डांगी लोग बास का अचार और चटनी बनाकर सब्जी के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं। दक्षिण गुजरात में कोटवाडिया एकमात्र आदिम जनजाति है जो पारंपरिक बांस संस्कृति का संरक्षण कर रही है। वे उनसे कलाकृतियाँ और खिलौने बनाते हैं। ये सभी उत्पाद सोविनीयर शॉप पर आप देख सकते हैं और खरीद भी सकते हैं।

उद्यान के पिछले हिस्से में एक नियंत्रित वातावरण के तहत दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त पौधों के प्रवर्धन के लिए एक नर्सरी अनुभाग है। आगंतुक इन पौधों को गार्डन शॉप से खरीद सकते हैं।

स्टेशन १४

बाम्बू प्लॉट और नर्सरी

अब आप इस यात्रा का सबसे दिलचस्प पड़ाव पर आ गए हो। आपके सामने खड़े पेड़ से एक पत्ता तोड़ो। इसे थोड़ा सा मसलों। सूंगो और अब चखो। इसकी गंध और स्वाद कैसा है? क्या ये वो है जिसे आप अक्सर अपने भोजन के ठीक बाद खाते हैं? क्या आप इसका नाम बता सकते हैं? यह पेड़ कोठू का हैं। दक्षिण भारत का यह पेड़ अपने गूदेदार सख्त गोल फल के लिए प्रसिद्ध है। यह रक्तस्राव को नियंत्रित करता है और यह फल कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और विटामिन सी से भरपूर है। यह पौधा नींबू के कुल से है और इसलिए यह साइट्रिक, ऑक्सालिक, मैलिक और टैनिक एसिड से भरपूर होता है। हालाँकि, जिन पत्तियों को आपने सूंघा था, उसमे से सौंफ की सुगंध या रही थी लेकिन सौंफ जीरा के कुल से है और ये दोनों कुल एक दूसरे से काफी दूर हैं. तो, कोठू के पत्ते सौंफ की तरह क्यों गंध और स्वाद रखते हैं? क्या उनमें कुछ समानता है? इसे खुद पता कीजिए और हमे बताइये ।

स्टेशन १५

कोठू

बोरसली भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्यारा हरा छोटा पेड़ है। घने, गहरे हरे चमकदार पत्ते और तारे के आकार के तीव्र सुगंधित फूलों के अपने पिरामिडनुमा मुकुट के आकर्षक रूप के कारण, इसे सजावट के लिए लगाया जाता हैं। पेड़ का वानस्पतिक नाम, Mimusops elengi में वंश ग्रीक शब्द Mimo और opsis से लिया गया है जिसका अर्थ है वानर के चेहरेसमान फूल। और जाति का नाम एलेंगी मलयाली भाषा से लिया गया हैं। वहाँ के लोग बोरसली को एलेंगी बुलाते हैं। । इसे मौलसरी के नाम से भी जाना जाता है, जिसका उल्लेख हमारे महाकाव्य रामायण और महाभारत में मिलता है। कालिदास के लोकप्रिय नाटक शकुंतला में भी इसका उल्लेख अन्य खूबसूरत फूलों वाले पौधों के साथ मिलता है। विश्व के सबसे मजबूत लकड़ियों में बोरसली का समावेश होता हैं। इसीलिए इसे बुलेट वुड ट्री भी कहा जाता हैं।

स्टेशन १६

बोरसली

क्या आप वनस्पति के उस भाग के बारे में जानते हैं जो मिट्टी के नीचे उगता है? हाँ, वे जड़ हैं। पर कभी-कभी, तने के ऊतक खाद्य सामग्री को संग्रहित करते हैं और उन्हें कंद कहा जाता है। चुकंदर, शकरकंद इसके कुछ उदाहरण हैं। आपके सामने वाले प्लॉट में कई कंद हैं।

हलुंद उनमें से है। कुछ दशक पहले ये कंद डांगी लोगों के दैनिक उपयोग में आता था। चिकित्सकीय प्रगति के कारण, समय के साथ इस पौधे का उपयोग धीरे-धीरे समाप्त हो गया। यह सभी पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का एक पौष्टिक स्रोत था। इसकी पत्तियों को सब्जी के रूप में और बीजों को दाल के रूप में खाया जाता सकता हैं। और इसकी जड़ें महिलाओं की प्रजनन क्षमता के लिए उपयोगी होती हैं। जब स्थानीय पादप विशेषज्ञ लासू और कासू बंधुओं ने एम एस यूनिवर्सिटी के वनस्पति विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर नागर को यह जानकारी दी; वन प्रभाग और उनकी टीम इस पौधे को इसके स्थानीय आवास में संरक्षित करने में सफल रही। वे स्थानीय लोगों में जागरूकता फैलाई गई और इस कंद को पुर्नउपयोग में लाया गया ।

स्टेशन १७

ट्यूबर (कंद) प्लॉट

कंद प्लॉट से बाहर निकलने पर, आपको आंशिक रूप से पर्णपाती, बड़े पेड़ को ग्रे छाल और सुंदर पत्ते के साथ देखेंगे, जिसकी ऊंचाई ६०-७० फीट तक हैं। यह पेड़ अक्सर सड़कों के किनारे पाया जाते है। ये मई-अगस्त से एक पीला फूल धारण करता है। जंग लगी, पुरानी तांबे जैसी फली के कारण इसे अंग्रेजी में को कॉपर-पॉड ट्री कहा जाता है। और इसलिए यह भारत में ताम्रफली के नाम से जाना जाता है। श्रीलंका, अंडमान, मलाया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया से उत्पन्न हुए इस पेड़ का वानस्पतिक नाम पेल्टोफोरम टेरोकार्पम हैँ। ग्रीक में वंश पेल्टोफोरम का अर्थ ढालधारक होता है, क्योंकि इसके फल झुलू लोगों द्वारा प्रयोग की गई लंबी ढाल समान होता है। और जाती टेरोकार्पम इसके पंखों वाले बीजों को संदर्भित करता है।

स्टेशन १८

ताम्रफली / पीला गुलमोहर

फल!

जब हम यह नाम सुनते हैं तो मेज पर रखी एक टोकरी जिसमें केले, सेब, अनानास और अंगूर रखे हैं की वो तस्वीर सामने आती है, जैसा कि हम अपने स्कूल के दिनों में बनाते थे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असल में फल क्या होता है? वे फूल के, अंडाशय के पकने का परिणाम स्वरूप हैं। प्रागैतिहासिक काल से ही फसलें हमारी सबसे बड़ी धरोहर रहे हैं। नवपाषाण और कांस्य युग के दौरान, लगभग ६००० से ३००० ईसा पूर्व मानव ने भूमध्यसागरीय फल जैसे खजूर, जैतून, अंगूर, अंजीर और अनार को उगाना शुरू किया था। नींबू और केले, सेब, नाशपाती अनार, बादाम, खुबानी, चेरी, आड़ू और आलूबुखारे को मध्य और पूर्वी एशिया उगाना शुरू किया गया। ब्लूबेरी, ब्लैकबेरी, पेकान और कीवी जैसे फल और मेवे इनको हाल ही में उगाना शुरू किया गया हैं। आपके सामने जो फ्रूट प्लॉट हैं इन सबकी एक झलक देता हैं।

स्टेशन १९

फ्रूट प्लॉट

इस वृक्ष की महिमा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता लेकिन अनुभव जरूर किया जा सकता है। आपने अपने जीवन में शायद ही इतना विशाल, भव्य और अदभुत वड का पेड़ देखा होगा। यह १५० साल पुराना पेड़ गुजरात का एकमात्र ऐसा पेड़ है जो १२०० मीटर के अपने वास्तविक आवास से कम ऊंचाई पर बढ़ रहा है। यह प्रागवड़ है। कहा जाता है कि जब भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मज्ञान दिया; उस ज्ञान को इस वृक्ष की जड़ों द्वारा अवशोषित किया गया था और स्तंभ मूल के माध्यम से पृथ्वी में समा गया। और इसलिए, यह हमेशा भारत के संतों का पसंदीदा पेड़ रहा है। आध्यात्मिक महत्व के अलावा, प्रागवाड़ यकृत विकार, व्रण और कुष्ठ रोग को ठीक करने की क्षमता रखता है। प्रागवाड़ की महिमा का अनुभव करने के लिए। हम अनुशंसा करते हैं कि आप इसके नीचे बैठें और उस ऊर्जा को महसूस करें जो यह वृक्ष अपनी शाखाओं के माध्यम से उत्सर्जित कर रहा है। आप अपनी इच्छा की किसी भी शाखा को गले लगा सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं कि कैसे पेड़ों को गले लगाने से आपका तनाव दूर होता है। कहा जाता है कि कई ऋषियों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए इसके छत्र के नीचे तपस्या की थी। हमारा सुझाव है कि आप इस पेड़ के साथ मौन में कुछ समय बिताएं और अपने भीतर इस पेड़ की ऊर्जा को देखें।

स्टेशन २०

प्रागवड

हम आशा करते हैं कि आपको वघई वनस्पति उद्यान के इस ऑडियो टूर में मजा आया होगा। और बहुत कुछ जानने को मिल होगा। इस सिलसिले में हमने उद्यान के दक्षिण क्षेत्र के पेड़ों और प्लॉट के बारे में बात की हैं। आपने सोचा होगा कि २४ हेक्टेयर में फैले इस बगीचे में केवल इतने ही दिलचस्प पौधे हैं…। दरअसल, नहीं। इस वनस्पति उद्यान में १००० से अधिक पौधों की प्रजातियां हैं। हमे पता है कि आप कम समय के लिए उद्यान में आयें हैं। हमने कम से कम समय में आपको उद्यान की एक रोमांचक झलक देने की कोशिश की है। यदि आप यहां कुछ और समय रुकते हैं, तो हम आपको उत्तर वघई वनस्पति उद्यान और औषधीय वनस्पति की एक और यात्रा पर ले जा सकते हैं। वहां आप ऐसे वनस्पतियों से मिलेंगे जो भारतीय चिकित्सा प्रणाली का अभिन्न अंग रहे हैं। इसके साथ ही, वनस्पति के बड़े कुलों में से ऑर्किड हैं, कैक्टस की अनोखी दुनिया आपकी रुचि को आकर्षित करेंगी। डांग प्लॉट आपको घने और ऊंचे पेड़ों से आकर्षित करेगा। आप उद्यान के विशिष्ट सदस्यों से मिलेंगे। साथ ही में उद्यान के ऐतिहासिक वनस्पति के संग्रह की मुलाकात लेंगे। अन्य दौरों के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया कार्यालय में संपर्क करें।

दक्षिण डांग वन विभाग वघई वनस्पति उद्यान में आने के लिए आपका धन्यवाद करता हैं।

जय हिंद, जय भारत।

स्टेशन २१

एंड नोट