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रूट २

वघई वनस्पति उद्यानकी औषधीय वनस्पतियाँ

रूट 2 आपको वाघई बॉटनिकल गार्डन के औषधीय हृदय की गहराई में ले जाता है, जहाँ सदियों से समुदायों को अपनी चिकित्सीय शक्तियों से संभालने वाले औषधीय पौधों पर केंद्रित है। मेडीसीनल प्लॉट से शुरू होकर आरोग्यवन खंड से गुजरते हुए, यह मार्ग हरड़, मोरिंगा, मधूनाशिनी, सर्पगंधा, कोकम, रक्तचंदन, मरोड़फली, करवी, मालकांगनी और पवित्र सीता अशोक जैसी शक्तिशाली प्रजातियों को उजागर करता है। प्रत्येक स्टेशन प्राचीन उपचारों की कहानियाँ खोलता है—मधुमेह नियंत्रण से लेकर बुखार निवारण, सर्पदंश के विषनाशक और मानसिक स्पष्टता तक—जो जातीय वनस्पति विज्ञान, औषध विज्ञान और स्थानीय लोककथाओं का मिश्रण है। एंडनोट तक पहुँचते हुए, आप प्रकृति की औषधालय के प्रति गहन प्रशंसा के साथ उभरते हैं, जहाँ हर पत्ता और जड़ पीढ़ियों के ज्ञान को धारण करती है।

परिचय

नमस्कार दोस्तों, वघई बॉटनिकल गार्डन में आपका स्वागत है। 1 मई, 1966 को तत्कालीन वन अधिकारियों, उद्यान अधीक्षक, वैज्ञानिक और विद्वानों द्वारा स्थापित, यह गुजरात राज्य का सबसे बड़ा उद्यान है। क्या आपने कभी सोचा है कि वनस्पति उद्यान अन्य उद्यानों से कैसे भिन्न हैं? वानस्पतिक उद्यान अन्य उद्यानों से भिन्न हैं क्योंकि उनका प्राथमिक सरोकार विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों का जीवित संग्रह तथा उनका संरक्षण, संवर्धन हैं। यह विद्यार्थियों, विद्वानों, वनकर्मियों तथा वनस्पतियों में रुचि रखने वाले आम जनता के लिए वनस्पतिशास्त्र का प्रशिक्षण केंद्र हैं।

आमतौर पर लोग सभी पेड़ों को ऐसे देखते हैं जैसे कि वे एक जैसे हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं और उनके उपयोग क्या हैं, यह आपको वनस्पति उद्यान में ही जानने, देखने और समझने को मिलता है।

भारत के पास प्राकृतिक विविधता की समृद्ध विरासत है। दुनिया के १७ मेगा-डाईवर्स देशों में भारत एशिया में चौथे और विश्व में दसवे स्थानपर हैं। भारत में विश्वभर के ११% वनस्पतियाँ पाई जाती हैं; जिसमे १७५०० सपुष्प, ६२०० स्थानीय और ७५०० औषधीय वनस्पतियाँ शामिल हैं। इसके अलावा २४६ वनस्पतियाँ ऐसी हैं जो जागतिकस्तर पे खतरे में हैं। इतनी सारी वनविविधातता दुनिया के केवल २.४ % भूमि क्षेत्र में स्थित हैं।

भारत में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पूर्वी हिमालय, इंडो-बर्मा क्षेत्र और पश्चिमी घाट यह चार जैव-विविधता हॉटस्पॉट हैं। पश्चिम घाट का उत्तरी भाग गुजरात के डांग के जंगलों से शुरू होता हैं जो बांस के लिए जाना जाता हैं।

भारत के वनों को वर्गीकृत करने की पहली पहल १९३६ में चैंपियन ने की। और १९६८ में सेठने उसका पुनरीक्षण किया। उन्होंने भारत के वनों को उष्णकटिबंधीय से अल्पाइन तक ६ प्रमुख खंडों में और २०० से ज्यादा उपखंडों में वर्गीकृत किया। चैंपिऑन और सेठ के वर्गीकरण के आधारपर उद्यान में सदाबहार, अर्ध-पर्णपती, पर्णपती और काँटेदार वन के अलग अलग विभाग हैं। इसके अतिरिक्त उद्यान में डांग प्लॉट, बांस प्लॉट, औषधीय प्लॉट, आरोग्यवन, कंद प्लॉट, कैक्टस और ओर्किड प्लॉट जैसे विभिन्न प्लॉट देखने को मिलते हैं। उद्यान हरड़े रोड, रेन ट्री रोड, नीलगिरी, बोरसली, कोठू रोड के ७.५ किलोमीटेर लंबे सड़कों के जाल-तंत्र से जुड़ा हुआ हैं।

आपको और अधिक इंतजार न कराते हुए आपको लेके चलते हैं पौधों की यात्रा पर। आइए प्रकृति की ओर वापस जाएं, प्रकृति से प्यार करें, और पौधों की दुनिया के छिपे हुए खजाने को जानें वघई वनस्पति उद्यान के औषधीय वनस्पतियों के साथ।

स्टेशन ००

परिचय

प्राचीन काल से, औषधीय वनस्पतियाँ मानव जाति के स्वास्थ्य और कल्याण को बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहीं हैं। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय, चीनी, यूनानी, सिद्ध, युरोपियन और अफ्रीकी जैसी दवाओं की कई प्रणालियाँ फली-फूलीं। भारत में, अन्य प्राकृतिक संस्थाओं के साथ-साथ पौधों की भी पूजा की जाती है। इसका वर्णन वेदों, पुराणों, संहिताओं और उपनिषदों जैसे शास्त्रों में भी मिलता हैं।

अष्टांग हृदय की एक कथा के अनुसार। भगवान ब्रह्मा ने एक बार अपने शिष्य जीवक को एक ऐसा पौधा ढूंढने को कहाँ जिसका कोई भी औषधीय उपयोग न हो। ११ साल ढूंढने के बाद उन्हें ऐसा कोई पौधा नहीं मिला जिसका कोई औषधीय उपयोग न हो। पुरस्कार के रूप में भगवान ब्रह्मा ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक के सम्मान से सम्मानित किया। यह कहानी हमें बताती है कि धरती पर मौजूद हर पौधे का कोई न कोई औषधीय महत्व अवश्य है।

उद्यान के मेडीसीनल प्लॉट में भारत से आयुर्वेद और योग, ग्रीस से यूनानी, द्रविड़ सिद्ध और जर्मनी से होम्योपैथी जैसी विभिन्न हर्बल प्रणालियों को एकीकृत किया गया है। इन प्रणालियों को भारत सरकार द्वारा आयुष के रूप में मान्यता प्राप्त हुई है और हमारी चिकित्सा की प्राचीन प्रणालियों के गहन ज्ञान को पुनर्जीवित करने की दृष्टि से आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई है।

इसमें छोटे-छोटे पॉकेट हैं। जिसमे एक ही प्रजाति के कई पौधे लगाए गए हैं। पौधे का वानस्पतिक तथा सामान्य नाम और उसके उपयोग उसपर लगे बोर्ड पे लिखे हुए हैं। औषधीय पौधों के तीन और प्लॉट हैं, आरोग्यवन जड़ी बूटी, आरोग्यवन झाड़ी और आरोग्यवन वृक्ष हैं।

इसमें चित्रक, तुलसी की प्रजातियाँ, अनंतमूल, ब्राह्मी, ज्योतिष्मती, अपराजीता, शतावरी, अश्वगंधा, सर्पगंधा, वज्रदंती और सालपर्णी जैसे पौधे हैं। इनमें से हम भारतीय औषधीय प्रणाली के कुछ रोचक और महत्वपूर्ण पौधों से रूबरू होंगे।

लेकिन, औषधीय प्लॉट में प्रवेश करने से पहले, क्या आप उन पेड़ों का अनुमान लगा सकते हैं जो रेन ट्री रोड के बाईं ओर समानांतर सड़क पर लगाए गए हैं? जाहिर है, हमें वहां जाकर देखना होगा।

स्टेशन ०१

वघई वनस्पति उद्यान की औषधीय वनस्पतियाँ

इस पेड़ पर अक्टूबर से दिसंबर तक फल लगते हैं। अब जमीन पर गिरे हुए फलों को देखो और उन्हें पहचानने की कोशिश करो। यदि नहीं पहचान सकते तो कोई बात नहीं! यह त्रिफला चूर्ण का एक घटक हैं। यह पेड़ कोंबरेटेसी कुल का है जिसके सदस्य अर्जुन, बेहड़ा, सादड़ आदि हैं। यह हरड़े का पेड़ है। जी हां, आपने खाना खाने के बाद इसका सेवन पाचन के लिए जरूर किया होगा। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्पन्न होने वाले इस पौधे में एंटीसेप्टिक, रेचक, मूत्रवर्धक और वायु नाशक गुण होते हैं। इसका उपयोग बुखार, रक्ताल्पता, हृदय विकार, दस्त और पेचिश को ठीक करने के लिए किया जाता है। और यह भारत में टैनिन के प्रमुख स्रोतों में से एक है। यह मीठा व कड़वा होने से पित्त में, कड़वा व कषाय होने से कफ में, तथा मीठा होने से वात आदि दोषों को दूर करता हैं।

स्टेशन ०२

हरड़े

क्या आप इस पेड़ को पहचानते हैं? हल्के पीले रंग और चिकनी छाल वाले इस पेड़ के सुंदर सफेद फूल लंबी हरी सींग में बदल जाती हैं।

यह सबका पसंदीदा और अत्यधिक औषधीय पौधा सहजन है। अंग्रेजी में इसे ड्रमस्टिक ट्री भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम मोरिंगा ओलीफ़ेरा, तमिल नाम मुरुंगई से आता है जो मुड़ी हुई फली को दर्शाता है, जबकि ओलीफ़ेरा का अर्थ तेल उत्पादक होता है। यह पेड़ दक्षिणी हिमालय का मूल निवासी है जहां से यह भारतीय उपमहाद्वीप और उसके बाहर भी फैला हुआ है। इसकी पत्तियों में संतरे से सात गुना ज्यादा विटामिन सी और केले से पंद्रह गुना ज्यादा पोटैशियम, गाजर से दस गुना ज्यादा विटामिन ए और पालक से पच्चीस गुना ज्यादा आयरन होता हैं। इसकी फलियाँ तो सब खाते हैं। पर क्या आपने कभी इसकी पत्तियों का सेवन किया हैं? और क्या आपको पता हैं की हम सब की पसंदीदा स्विस घड़ी की जान उसमे डलने वाले ऑइल में बसती यह ऑइल कुछ और नहीं मोरिंगा ऑइल हैं।

स्टेशन ०३

सहजन

क्या आप औषधीय प्लॉट की बाड़ पर चढ़े हुए पौधे को देख रहे हैं? क्या आप इसे जानते हो? यह एक जादुई पौधा है। यह आपके टेस्ट बड्स को निष्क्रिय कर देगा? विश्वास नहीं होता? इसमें से एक पत्ता तोड़कर कुछ देर चबाएं। फिर अगर आपके पास खाने के लिए कुछ है, कैंडी या चॉकलेट तो चबा चबा कर खाएं।

यह पौधा मधुनाशिनी का है। जो शुगर को बेअसर करता है। और इसलिए आयुर्वेद में पौधे का असाधारण महत्व है। यह पौधा रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है और इसलिए इसका उपयोग मधुमेह के लिए हर्बल दवाओं में किया जाता है। इसका सेवन करने के बाद कुछ समय तक आपको किसी चीज का स्वाद नहीं आएगा। यदि आपने ऐसा नहीं किया है, तो कर के देखे।

स्टेशन ०४

मधुनाशिनी

आपके सामने खडा यह पेड़ पुत्रंजीवा है। भारत और श्रीलंका के नेटिव, इस पेड़ के बीजों को माता-पिता अपने बच्चों के गले में इस विश्वास के साथ पहनाते हैं कि वे बुराइयों को दूर भगाएगा, उनकी रक्षा करेगा.

इसका वानस्पतिक नाम Putranjiva roxburghii स्थानीय नाम पुत्रंजीवा से लिया गया हैं। इसमे पुत्र शब्द संस्कृत से लिया गया हैं जबकि जीवा का अर्थ जीवन हैं। पुत्रंजीवा का अर्थ पुत्र का जीवन हैं। इस पेड़ में मार्च से मई तक फूल लगते हैं और फल को पकने में लगभग एक साल लग जाता हैं।

इसका उपयोग मुह व उदर के छालों में, महिलाओं के मासिक चक्र की नियमित करने के लिए तथा स्त्री और पुरुषों की प्रजनन क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता हैं।

स्टेशन ०५

पुत्रंजीवा

दक्षिण-पूर्व एशिया के मूल निवासी, इस पौधे को पहली बार १५ वीं शताब्दी में यूरोप लाया गया था। इसके नलिनुमा सफेद फूल पीले फल में बदल जाते हैं जिसमें ५-८ चक्राकार बीज होते हैं। इनके बीजों में स्ट्रिकनिन नामक अल्कलॉइड पाया जाता हैं। यह एक घातक जहर है, जो तीव्र मांसपेशियों की ऐंठन पैदा करता है। इस पौधे का जहर जानवरों का शिकार करने के लिए तीर और भालों पर लगाया जाता था।

अगर ये पौधा इतना जहरीला है तो औषधीय कैसे? दरअसल, यह केवल बाहरी उपयोग के लिए है। दर्द को दूर करने और विभिन्न प्रकार के ट्यूमर के इलाज के लिए इसका बाहरी उपयोग किया जाता है। यह पाचन समस्याओं, जुकाम के प्रति संवेदनशीलता, चिड़चिड़ापन और उदासीनता के लिए निर्धारित एक सामान्य होमिओपैथिक उपचार है। स्ट्रिकनिन में अँटिकैंसररस गुण पाए जाते हैं। चेतावनी: कृपया डाक्टर की सलाह के बिना इसका सेवन न करें।

स्टेशन ०६

कुचला

सर्पगंधा दक्षिणी और दक्षिण पूर्वी एशिया का स्थानीय पौधा है। यह चरक संहिता में मानसिक बीमारी और अनिद्रा के इलाज के लिए सूचीबद्ध है। ऐसा माना जाता हैं के जहाँ यह पौधा उगता हैं साप उस स्थान पर नहीं आते। तथा सांपों के जहर का प्रभाव दूर करने में इस पौधे का प्रयोग किया जाता था। जड़ में रेसरपिन नामक अल्कलॉइड्स होता है। जिसका उपयोग उच्च रक्तचाप को कम करने और मानसिक बीमारी के लक्षणों को कम करने में व्यापक रूप से किया जाता है।

स्टेशन ०७

सर्पगंधा

आपके सामने यह जो पेड़ हैं। इसके फलों को अक्सर कुछ व्यंजनों में इमली के विकल्प में लाया जाता है। क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह क्या है? यह कोकम हैं। अंग्रेजी में इसे गोवा बटर ट्री के नाम से जाना जाता है। इस पेड़ में नवंबर से फरवरी तक फूल आते हैं और मार्च से मई तक फल लगते हैं। भारतीय मूल के इस पौधे को महाराष्ट्रीयन और गोवा के व्यंजनों में खटास के लिए इमली के विकल्प के रूप में उपयोग किया जाता है। फल में रसदार गूदा होता है जिसे अक्सर कोकम बटर कहा जाता है। यह सामान्य ताप पर ठोस होता है। इसे चॉकलेट और मिठाइयों में प्रयोग किया जाता है। इसका उपयोग मलहम, त्वचा और बालों की देखभाल करने वाले उत्पादों में किया जाता है। इसके फलों के रस को कोंकणी में आगुल कहा जाता है। और उसका शरबत भी बनाया जाता हैं। साइअन्टिफिक रिसर्च के अनुसार, इसका सेवन करने से वजन घटाने में सहायता मिलती हैं। तो क्यों न इमली की जगह हम इसका प्रयोग करें?

स्टेशन ०८

कोकम

दक्षिण-पूर्वी एशिया के मूल निवासी इस पेड़ में धब्बेदार या धारीदार लाल रंग की लकड़ी होती है। यह लालचंदन है। जैसा के आपने फिल्मों में देखा होगा। अवैध कटाई और तस्करी ने इस पौधे को संकटग्रस्त बना दिया है। इसकी लकड़ी कील-मुंहासों, दाग-धब्बों और अन्य चर्म रोगों को दूर करने के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। यह रक्त को शुद्ध करता है और ज्वरनाशक तथा स्वेदजनक भी होता हैं। यह रक्तसत्राव जैसे विकारों और सूजन में भी उपयोगी है। आज अगर इसे संरक्षित नहीं किया गया तो शायद हमारी अगली पीढ़ी इस पौधे को सिर्फ फिल्मों में ही देख पाएगी।

स्टेशन ०९

रक्तचंदन

क्या आपने कभी एक छोटे भूरे-सफेद पथरीले बीज को किसी खुरदरी सतह पर रगड़कर अपने दोस्त को स्पर्श कराया हैं? तो उसने क्या किया? क्या वो क्या आपकी बचपन की ऐसी कोई याद है? अगर नहीं, तो आप इसे बाद में कर सकते हैं। इस पौधे को विभिन्न नामों से जाना जाता है। अंग्रेजी में इसे फीवर नट कहा जाता है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के बुखारों को ठीक करता है। यह एक झाड़ी है और समुद्र तटों के पास पाई जाती है, इसके बीज गोटी की तरह दिखते हैं और इसलिए इसे हिंदी में सागरगोटा या सागरगोटी कहा जाता है। चूँकि इसके बीज कौवे के अंडे समान होते हैं इन्हे गुजराती में काकचियों भी कहा जाता हैं। इसके फल शक्तिवर्धक और ज्वरनाशक होते हैं। बीज के तेल का उपयोग सौंदर्य प्रसाधनों में और कान को बहने से रोकने में किया जाता है। इसके सक्त बीज ताजे और खारे पानी में तैरते हैं जिससे ये समुद्र की लहरों के साथ साथ बहकर सारे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वितरित हुएँ हैं।

स्टेशन १०

सागरगोटा

आपके सामने लगे पौधे के फलों को देखिए? कैसे दिखते हैं वो? पेट में उठी मरोड़ को ठीक करने के लिए यह उपयोगी होते हैं। जैसा नाम वैसा काम यह हैं मरोड़सिंग। इसके मुड़े हुए और पेंच जैसे फलों के कारण इसे अंग्रेजी में इंडियन स्क्रू ट्री भी कहा जाता हैं। इसका वानस्पतिक नाम हेलिक्टेरेस आइसोरा है। इसके फल और जड़ों का उपयोग एशिया, इराक और दक्षिण अफ्रीका की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में किया जाता है। ये एंटीऑक्सिडेंट, कार्ब्स, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, फॉस्फोरस और आयरन से भरपुर होता है। इसका उपयोग जठरांत्रीय विकारों, मधुमेह, कैंसर और संक्रमण के इलाज के लिए किया जाता है।

स्टेशन ११

मरोड़सिंग

यह छोटा पेड़ जावा, दक्षिण-मध्य चीन और पाकिस्तान का मूल निवासी है। इसे ब्लैक करंट ट्री भी कहा जाता है। यह एक लंबे समय तक रहने वाली,बड़े बड़े वृक्षोंकी छाया में उगने वाली प्रजाति हैं। विभिन्न इलाकों में इसके फलों और पत्तियों के विभिन्न उपयोग हैं। लाओस के लुआंग प्रबांग में फफूंद से बने सूप को खट्टा स्वाद देने के लिए पत्तियों को मिलाया जाता है। उत्तर-पूर्वी कंबोडिया के बुनोंग लोग खांसी के इलाज के लिए पौधे का इस्तेमाल करते हैं। ओडिशा में आदिवासी और ग्रामीण लोग, नई कोमल पत्तियों का उपयोग सब्जियों के रूप में करते हैं। इन पत्तियों को या तो तला जाता है या नमक के साथ उबाला जाता है, और चावल के साथ एक व्यंजन के रूप में परोसा जाता है। पत्तियों का उपयोग बच्चों के पेट दर्द, पाचन संबंधी समस्याओं और मधुमेह के लिए किया जाता है।

स्टेशन १२

ब्लैक करंट ट्री

औषधीय प्लॉट के साथ, वघई वनस्पति उद्यान में विभिन्न रोगों के पौधों का एक और खास प्लॉट हैं। यह आरोग्यवन हैं। इसके तीन विभाग हैं, हर्ब, श्रब और ट्री मतलब शाक, झाड़ी और वृक्ष। भगत कुटीर से शुरू होकर यह आरोग्यवन वृक्षों पर समाप्त होता है। डांग में, भगत पारंपरिक औषधीय पौधों का अभ्यास करने वाले स्थानीय व्यक्ति थे। वे वैद्यों और हकीमों के समान थे। पहला खंड जड़ी-बूटियों का है जिसमें बाला, अतिबाला, महाबाला और नागबाला जैसी प्रजातियाँ हैं जो शरीर को शक्ति प्रदान करने के लिए जानी जाती हैं, इसमें पांडनस और जलजामिनी की प्रजातियाँ भी हैं जो पानी को जेली बनाती हैं। यह पर तुलसी की भी अनेक प्रजातियान पाई जाती हैं। दूसरे खंड की झाड़ी में भम्मरछाल, कारवी, दमवेल आदि पौधे हैं और अंतिम खंड में औषधीय पेड़ हैं। हम आग्रह करते हैं कि आप अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए अधिक से अधिक से अधिक पौधों का संज्ञान ले।

स्टेशन १३

आरोग्यवन

भूरे- रंग की छाल वाले इस पेड़ को हिंदी में काला बचनाग, गुजराती में भम्मरछाल और अंग्रेजी में ब्राइडल काउच ट्री कहा जाता है। इस पेड़ की छाल का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में किया जाता है और यह स्वाद में कसैला हैं, यह ज्वरनाशक हैं, और इसका प्रयोग मियादी बुखार को उतारनेमें किया जाता हैं। इसका उपयोग पाचन, अंतःस्रावी, प्रजनन और श्वसन प्रणाली से संबंधित बीमारियों के इलाज में किया गया है। तथा इसमे जठरांत्रीय और मूत्रमार्ग के संक्रमण का इलाज करने के गुण हैं।

स्टेशन १४

काला बचनाग

जनवरी से मार्च तक खिलने वाले इस पौधे की उत्पत्ति भारत में हुई है। यह एक मध्यम आकार का पर्णपाती पेड़ है और इसका छोटा टेढा मुड़ा हुआ तना और गहरी-भूरी दरार वाली छाल होती है। इसकी जड़ के रस को दो काली मिर्च के साथ मिलाकर सेवन करने से आंखों की परेशानी दूर होती है। छाल का पेस्ट घाव पर लगाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम ओजिनिया ओजेनेंसिस उज्जैन शहर से लिया गया है। दिलचस्प बात यह हैं की जब इसके फूल खिलते हैं तब ऐसा लगता हैं के आसमान पर एक शामियाना बना हैं।

स्टेशन १५

संदन

आरोग्यवान में अगला प्लांट कार्वी है। आदिवासी जाति इस पौधे का उपयोग सूजन संबंधी विकारों के इलाज के लिए करते हैं। इसके पत्तों का रस पेट की बीमारियों को दूर करता है। सूजनरोधी के साथ, इस पौधे में रोगाणुरोधी और आमवाती विरोधी गुण होते हैं। इसका जीवन चक्र इसे और भी दिलचस्प बनाता है। यह पौधा मानसून के हर आगमन के साथ जीवित हो जाता है। लेकिन मानसून खत्म होने के साथ इसमे सिर्फ सूखे और मृत तने रह जाते हैं। यह सिलसिला सात साल तक दोहराया जाता हैं। जैसे ही यह पौधा अपने आठवें वर्ष में प्रवेश करता है, पौधा बड़े पैमाने पर पुष्प धरण करने लगता है। इसके फूल जामुनी रंग के होते हैं और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

स्टेशन १६

मरुआदाना (कारवी)

भारत के मूल निवासी, हमारी यात्रा में का अगला पौधा दमवेल है। अपने सामान्य नाम के अनुसार, पौधे का उपयोग दमा या अस्थमा और अन्य एलर्जीक बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। पौधे का वानस्पतिक नाम टाइलोफोरा इंडिका है। जिसमे जीनस नाम टायलोफोरा का अर्थ गाँठ वाला होता है जबकि प्रजाति इंडिका का तात्पर्य भारत का मूल निवासी है। दमा-रोधी गुणों के अलावा इस पौधे में सूजन-रोधी, कैंसर-रोधी और दस्त-रोधी गुण भी होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार इसकी एक पत्ती को खाली पेट खाने से १ या ५ मिनट में ही कफ उलटी के साथ बाहर निकाल जाता हैं और आप तुरंत हल्का महसूस करते हैं।

स्टेशन १७

अन्तमूल

भारतीय मूल का यह पौधा लंबी पतली शाखाओं वाली एक बेल है। यह लाल भूरे रंग की होती है और सफेद वातरँधो से ढकी होती है। इसकी छाल, पत्तियों और बीजों का औषधीय रूप से उपयोग किया जाता है। छाल गर्भनिरोधक, विरेचक और ब्रेन टॉनिक है। अफीम की विषाक्तता के लिए पत्तों का रस एक अच्छा प्रतिषेधक है। बीज से निकाला गया तेल स्वाद में कड़वा, तापजनक और बुद्धि को बढ़ाने वाला होता है। इस वेला को हिंदी में मलकांगनी के नाम से जाना जाता है।और संस्कृत में इसे ज्योतिष्मती कहते हैं अर्थात बुद्धि को प्रबल करने वाली। इसका उल्लेख आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ भाव प्रकाश निघंटु में मिलता है। इसपर पर छोटे अण्डाकार-गोल फल लगते हैं, इसलिए इस पौधे को सूक्ष्मफला भी कहा जाता है और वे कौवे के अंडे की तरह दिखते हैं, इसलिए इसे काकांडकी भी कहा जाता है। इसके बीजों से पीले रंग का तेल निकलता है इसलिए इसे पीत तेल भी कहते हैं।

स्टेशन १८

मालकांगनी

क्या आपने अशोक वाटिका के बारे में सुना हैं, जहां रावण ने सीताजी को रखा था। और अशोकारिष्ट के बारे में? और किसी दु:ख हरण करने वाले वृक्ष के बारे में? जी हाँ में अशोक के बारे मे ही बात कर रही हूँ, कई बार इस पेड़ को ऊंचे सीधे पेड़ असोपालव से भ्रमित कर दिया जाता है। असली अशोक या सीता अशोक का पेड़ आपके सामने है। इस पेड़ पर दिसंबर से अप्रैल तक पीले-नारंगी फूल लगते हैं और साल भर फल लगते हैं। यह पेड़ भारत, श्रीलंका, म्यांमार और मलेशिया के मूल निवासी है। इस पौधे की छाल का उपयोग स्त्रीरोग जैसे की गर्भाशय संबंधी विकार, कष्टार्तव और अत्यार्तव के इलाज के लिए किया जाता है। इसके फूलों का उपयोग बवासीर, खाज और त्वचा रोगों के इलाज के लिए भी किया जाता है।

स्टेशन १९

सीता अशोक

इस वृक्ष की महिमा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता लेकिन अनुभव जरूर किया जा सकता है। आपने अपने जीवन में शायद ही इतना विशाल, भव्य और अदभुत वड का पेड़ देखा होगा। यह १५० साल पुराना पेड़ गुजरात का एकमात्र ऐसा पेड़ है जो १२०० मीटर के अपने वास्तविक आवास से कम ऊंचाई पर बढ़ रहा है। यह प्रागवड़ है। कहा जाता है कि जब भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मज्ञान दिया; उस ज्ञान को इस वृक्ष की जड़ों द्वारा अवशोषित किया गया था और स्तंभ मूल के माध्यम से पृथ्वी में समा गया। और इसलिए, यह हमेशा भारत के संतों का पसंदीदा पेड़ रहा है। आध्यात्मिक महत्व के अलावा, प्रागवाड़ यकृत विकार, व्रण और कुष्ठ रोग को ठीक करने की क्षमता रखता है। प्रागवड़ की महिमा का अनुभव करने के लिए। हम अनुशंसा करते हैं कि आप इसके नीचे बैठें और उस ऊर्जा को महसूस करें जो यह वृक्ष अपनी शाखाओं के माध्यम से उत्सर्जित कर रहा है। आप अपनी इच्छा की किसी भी शाखा को गले लगा सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं कि कैसे पेड़ों को गले लगाने से आपका तनाव दूर होता है। कहा जाता है कि कई ऋषियों ने ज्ञान प्राप्ति के लिए इसके छत्र के नीचे तपस्या की थी। हमारा सुझाव है कि आप इस पेड़ के साथ मौन में कुछ समय बिताएं और अपने भीतर इस पेड़ की ऊर्जा को महसूस करें।

स्टेशन २०

प्रागवड

हम आशा करते हैं कि आपने वघई वनस्पति उद्यान के इस ऑडियो टूर का आनंद लिया होगा। इसी यात्रा में हमने वघई बॉटनिकल गार्डन के औषधीय प्लॉट के बारे में बात की। आपने सोचा होगा कि 24 हेक्टेयर में फैले इस बगीचे में केवल इतने ही दिलचस्प पौधे है?। असल में नहीं। उद्यान में १००० से अधिक पौधों की प्रजातियां हैं। हमे पता है कि आप कम समय के लिए उद्यान में आए हैं। और इसीलिए हमने कम से कम समय में आपको उद्यान की एक झलक देने की कोशिश की है। अगर आप यहां कुछ और वक्त रुकते हैं तो हम आपको उद्यान के उत्तर और दक्षिण विभाग की दो और यात्राओं पर ले जा सकते हैं। वहाँ आपको महान महोगनी, बरसाती पेड़, कैलासपति और सौंफ जैसी गंध रखने वाले पेड़ जैसे अद्भुत पेड़ मिलेंगे। इसके साथ ही, ऐसे ऑरकिड्स और कैक्टस की अद्भुत दुनिया देखने को मिलेगी जो आपका ध्यान आकर्षित कर सकती हैं। डांग प्लॉट आपको घने और ऊंचे पेड़ों से आकर्षित करेगा। आप उद्यान के विशिष्ट सदस्यों से भी मिलेंगे। और उद्यान की ऐतिहासिक वनस्पति के संग्रह के बारें मे पता चलेगा। हम आशा करते हैं के आपको वह दौरे भी पसंद आएंगे। अन्य दौरों के बारे में अधिक जानने के लिए कृपया कार्यालय में संपर्क करें।

दक्षिण डांग वन विभाग वघई वनस्पति उद्यान में आने के लिए आपका धन्यवाद।

जय हिंद, जय भारत।

स्टेशन २१

एंडनोट